संस्थान का इतिहास

भा.प्रौ.सं. की संकल्पना को सर्वप्रथम वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में तत्समय शिक्षा सदस्य श्री एन. एम. सरकार द्वारा वर्ष 1945 में एक रिपोर्ट में समाविष्ट किया गया था। उनकी सिफारिशों के अनुसरण में, प्रथम भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान की स्थापना वर्ष 1950 में खडगपुर में की गई थी। अपनी रिपोर्ट में श्री सरकार ने सुझाव दिया था कि ऐसे संस्थान देश के विभिन्न भागों में भी प्रारम्भ किए जाने चाहिए। सरकार समिति की इन सिफरिशों को स्वीकार कर लेने पर भारत सरकार ने सहायता के लिए तत्पर मित्र देशों की सहायता से प्रौद्योगिकी संस्थानों की स्थापना करने का निर्णय लिया। सहायता का प्रथम प्रस्ताव यू.एस.एस.आर. की ओर से आया जिसने यूनेस्को के माध्यम से मुम्बई में एक संस्थान स्थापित करने में सहायता करने के लिए अपनी सहमति दी। इसका अनुसरण पश्चिम जर्मनी, यू.एस.ए. तथा यू.के. के सहयोग से क्रमश: मद्रास, कानपुर तथा दिल्ली में प्रौद्योगिकी संस्थानों की स्थापना से किया गया। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, गुवाहाटी की स्थापना 1995 में की गई तथा वर्ष 2001 में रुडकी विश्वविद्यालय को एक भा.प्रौ.सं में रूपांतरित किया गया था।

भारत सरकार ने दिल्ली में एक प्रौद्योगिकी संस्थान की स्थापना में सहयोग के लिए ब्रिटिश सरकार के साथ बातचीत की। ब्रिटिश सरकार सिद्धांतत: ऐसे सहयोग के लिए सहमत थी किन्तु वह आरम्भ में एक साधारण तरीके से शुरुआत करने की ओर प्रवृत्त थी। अत: यह सहमति हुई कि दिल्ली में उनकी सहायता से एक इंजीनियरी एवं प्रौद्योगिकी महाविद्यालय की स्थापना की जाए। यू.के. सरकार तथा लंदन में ब्रिटिश उद्योग संघ की सहायता से दिल्ली इंजीनियरी महाविद्यालय न्यास नामक एक न्यास की स्थापना की गई। बाद में एडनबर्ग के ड्यूक एच.आर.एच. प्रिंस फिलिप्स ने भारत के अपने दौरे के दौरान 28 जनवरी, 1959 को हौज़ खास में महाविद्यालय की आधारशिला रखी।

इंजीनियरी एवं प्रौद्योगिकी महाविद्यालय को 1860 के सोसायटी पंजीकरण अधिनियम सं. XXI (1960-61 की पंजीकरण संख्या एस 1663) के अंतर्गत 14 जून, 1960 को एक सोयायटी के रूप में पंजीकृत किया गया। पहले दाखिले सन् 1961 में किए गए। विद्यार्थियों को 16 अगस्त 1964 को महाविद्यालय में रिपोर्ट करने के लिए कहा गया तथा महाविद्यालय का औपचारिक उद्घाटन 17 अगस्त, 1961 को वैज्ञानिक अनुसंधान एवं सांस्कृतिक मामलों के मंत्री प्रो. हुमायूं कबीर द्वारा किया गया। महाविद्यालय दिल्ली विश्वविद्यालय के साथ सम्बद्ध था।

अधिनियम की धारा 4 के अनुसार प्रत्येक संस्थान एक निगमित निकाय होगा जिसका शाश्वत पदाधिकार होगा तथा एक संस्थान की सील होगी जिसके नाम से मुकदमा चलाया जा सकेगा। प्रत्येक संस्थान के लिए गठन किए गए निगमित निकाय में एक अध्यक्ष एक निदेशक तथा तत्समय संस्थानों के बोर्ड के अन्य सदस्य होंगे। भा.प्रौ.सं. दिल्ली प्रौद्योगिकी संस्थान अधिनियम, 1961 के तहत जिसे प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम 1963 द्वारा संशोधित किया गया तथा उसके अंतर्गत बनाई गई संविधियों के अनुसार कार्य कर रहा है। संस्थान के सामान्य कार्यों का पर्यवेक्षण, निदेशन तथा नियंत्रण का उत्तरदायित्व अभिशासक परिषद में निहित है। अभिशासक परिषद अपनी स्थायी समितियों जैसे वित्त समिति, भवन एवं निर्माण समिति तथा ऐसी अन्य तदर्थ समितियों के माध्यम से कार्य करता है जिनका गठन इसके द्वारा समय-समय पर विशिष्ट मुद्दों पर विचार करने के लिए किया जाता है। संस्थान के अनुदेश, शिक्षा तथा परीक्षा के मानकों के अनुरक्षण का नियंत्रण एवं सामान्य विनियम सीनेट (अभिषद) में निहित है। अभिषद, शैक्षिक नीतियों तथा पाठयाचर्या के निरूपण अध्ययन पाठ्यक्रम एवं परीक्षा प्रणाली तैयार करने के लिए उत्तरदायी है। अभिषद समय-समय पर उठने वाले विशिष्ट मामलों की जांच/देखरेख करने के लिए उसके द्वारा गठित किए जाने वाले स्थायी बोर्डों/समितियों तथा उप समितियों के माध्यम से कार्य करती है।

संस्थान के उद्देश्य

भा.प्रौ.सं. दिल्ली के लिए भा.प्रौ.सं. परिषद द्वारा समनुदेशित उद्देश्य तथा लक्ष्य निम्नलिखित हैं:-
1.अनुप्रयुक़्त विज्ञान एवं इंजीनियरी में विश्व में सर्वोत्तम तुलनीय स्तर के अनुदेशों को प्रस्तुत करना;
2.विशेषज्ञता प्राप्त अनुसंधान कार्यकर्ताओं तथा अध्यापकों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्नातकोत्तर अध्ययन एवं अनुसंधान हेतु पर्याप्त सुविधाऍं उपलब्ध करना;
3.पाठयाचर्या आयोजन, प्रयोगशाला विकास तथा परीक्षा प्रणालियों में नेतृत्व प्रदान करना;
4.अपने स्टॉफ के लिए तथा अन्य इंजीनियरी महाविद्यालयों के अध्यापकों के लिए संकाय विकास हेतु कार्यक्रम स्थापित करना (प्रारम्भ करना);
5.अंतरविद्याशाखीय स्वरूप के अध्यापन एवं अनुसंधान कार्यक्रम स्थापित करना;
6.जीवन्त औद्योगिक समस्याओं के समाधान के लिए कार्मिकों के आदान-प्रदान, अनुवर्ती शिक्षा कार्यक्रमों तथा परामर्श सेवाओं के जरिए उद्योग के साथ निकट से सहयोग बनाना।
7.राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं तथा सरकारी विभागों सहित अन्य संस्थानों एवं संगठनों के साथ मजबूत सहयोगात्मक संबंध बनाना।

इन सात उद्देश्यों के अतिरिक़्त नई शिक्षा नीति के संदर्भ में निम्नलिखित उद्देश्य और जोडे गए थे:-

8.नियोजित इंजीनियरों के लिए अनुवर्ती शिक्षा कार्यक्रम तैयार करना तथा उन्हें परिसर में एवं साथ ही परिसर से इतर अवस्थितियों पर दूरस्थ अधिगम तकनीकों द्वारा उपलब्ध कराना;
9. भारत के लिए प्रौद्योगिकी आवश्यकताओं का पूर्वानुमान लगाना तथा उनकी पूर्ति हेतु योजना बनाना एवं तैयारी करना;
10.पारम्परिक के साथ-साथ दृश्य-श्रव्य वीडियो तथा कम्प्यूटर आधारित पद्धतियों से अनुदेशात्मक संसाधन सामग्री तैयार करना;
11.हमारे देश के पुरुषों एवं महिलाओं में वैज्ञानिक विचारधारा एवं प्रयास की भावना उत्पन्न करने के लिए समुदाय के बडे वर्ग के साथ पारस्परिक संपर्क स्थापित करना;
12.संस्कृति के अनुरक्षण एवं संरक्षण के लिए विकास कार्य करना;
13.असंगठित क्षेत्र तथा स्वरोजगार के लिए भी जनशक्ति को तैयार करने के लिए अपने अध्ययन कार्यक्रमों का आयोजन करना।